Thursday, January 7, 2010

दिवस का अवसान...........................

श्री अयोध्या सिंह उपाध्याय *हरिऔध *जी की रचनाएँ मुझे बेहद पसंद है
बचपन में हिन्दी की एक किताब में श्री हरिऔध जी एक कविता थी जिसे मुझे कंठस्थ करनें का आदेश गुरुजनों ने दिया था .स्कूल के वार्षिक उत्सव पर यह गीत मैंने पूरे मन से गाया था जिसे मैं आज भी भूल नहीं पाती। अक्सर तनाव के पलों में मुझे यह गीत बहुत राहत देता है ।
आज मैं इस गीत को आपसे भी साझा करना चाहती हूँ , आशा है यह आप सब द्वारा भी पढ़ा -सुना गया होगा.
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दिवस का अवसान समीप था
गगन था कुछ लोहित हो चला
तरु शिखा पर थी अब राजती
कमलिनी कुल वल्लभ की प्रभा

विपिन बीच विहंगम वृंद का
कल निनाद विवर्धित था हुआ
ध्वनिमयी विविधा विहगावली
उड़ रही नभ मंडल मध्य थी

अधिक और हुई नभ लालिमा
दश दिशा अनुरंजित हो गयी
सकल पादप पुंज हरीतिमा
अरुणिमा विनिमज्जित सी हुई

झलकते पुलिनो पर भी लगी
गगन के तल की वह लालिमा
सरित और सर के जल में पड़ी
अरुणता अति ही रमणीय थी।।

अचल के शिखरों पर जा चढ़ी
किरण पादप शीश विहारिणी
तरणि बिंब तिरोहित हो चला
गगन मंडल मध्य शनै: शनै:।।

ध्वनिमयी करके गिरि कंदरा
कलित कानन केलि निकुंज को
मुरलि एक बजी इस काल ही
तरणिजा तट राजित कुंज में।।

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10 comments:

  1. बहुत सुन्दर -यह गीत मुझे भी बेहद प्रिय है -मैं और मनोज तो इसे खूब लय बढ गए भी है .
    इसे पॉडकास्ट भी करिए या मनोज से कहिये वे पॉडकास्ट करेगें तब सुनिए भावातीत अनुभूति देता है .

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  2. यह कविता हमारे इंटर सिलेबस में थी। उपाध्याय जी संस्कृत वर्ण वृत्तों में हिन्दी की अतुकांत रचनाएँ करते थे। बारह बारह वर्णों के इस संस्कृत छन्द प्रकार को बताइए- या मुझसे ही श्रम करवाएँगीं?

    इसकी गेयता और वर्णन सौन्दर्य अद्भुत है। कौन कहता है कि गेय होने के लिए तुक का मिलना आवश्यक है? संस्कृत छ्न्दों के सौन्दर्य को हिन्दी में सफलता पूर्वक ला कर उपाध्याय जी ने हिन्दी को समृद्ध किया।
    इस रचना को पुन: पढवाने के लिए आभार।

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  3. स्कूली दिन याद दिला दिये आपने. गिरिजेश जी ठीक कह रहे हैं गेय होने के लिए तुक का मिलना आवश्यक नहीं, अब पूरे वेद देखिये, तुकांत न होकर भी कितने गेय हैं.

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  4. @ गिरिजेश राव साहब
    महराज !
    भवानी ने भाव साझा करने को कहा है .. आप तो
    गजब निकले , शिल्प - साझा में ही उलझ गए साहब ! :) :) :)
    .
    .
    गीत तो प्रिय है ही .. दिवस के अवसान पर '' लोहित '' व्यंजक भी खूब है ..
    'पॉडकास्ट' हो तो स्कूल जैसा ही साझा हो ..
    ..... आभार ,,,

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  5. आप तकनीक की ज्ञाता होकर भी, साहित्य में रुचि रखती हैं और कोमल भावनाओं को बेहतरीन तरह से व्यक्त करती हैं। यहां आ कर अच्छा लगा।

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  6. आभार इस रचना के लिए .........

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  7. विहगावली कमलिनी ka meaning kya h

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  8. This type of poetry suits a particular audience only where the poet tries to use as many words to impress weather or not appropriate for poetic expressions.

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