Tuesday, January 5, 2010

मैं तुम्हारी नहीं लेकिन....

मैं तुम्हारी नहीं लेकिन
दृष्टि बाधित नयन क्यों है.
गाल-बजाना फिर फुलाना,
चितवनों का चक्र पल-पल ,
भृकुटी टेढ़ी दर्द क्यों है.
गर नहीं मै तेरी तो फिर ,
आना-जाना और ठहरना,
कनखियों से बारी-बारी ,
हाल बेसुध क्यों हुआ है
मैं तुम्हारी नहीं लेकिन................................


7 comments:

  1. बहुत अच्छी लगी यह कविता...

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  2. नैसर्गिकता पर सवाल भी अजब !

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  3. चिरन्तन स्नेह की मूक अभिव्यक्ति

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  4. शब्दों का खूबसूरत प्रयोग करती है आप ..भाव भी गहरे है ..और खूबसूरत सृंगार कर सकती है आप यक़ीनन

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  5. प्रेम को स्वीकार करना भी एक कला है ...... सुंदर रचना .......

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